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05 June 2013

आखिर कौन 'खेल' रहा बच्चों के खिलौनों से

सालाना 18 करोड़ का बजट, मगर केंद्रों पर नहीं पहुंचते पर्याप्त खिलौने

लखनऊ : बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग द्वारा आंगनबाड़ी केंद्रों पर आने वाले छोटे बच्चों के मनोरंजन के लिए सालाना 18 करोड़ रुपये के खिलौने खरीदे जाते हैं, लेकिन यह खिलौने उनको नसीब नहीं होते। सच यही कि खिलौनों की खरीददारी में कभी सलीके से यह बड़ी रकम खर्च नहीं हो पायी। अब तक न तो इसके लिए टेंडर प्रक्रिया अपनायी गयी और न ही मानक के अनुरूप खिलौने खरीदे गये। फिर यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इन खिलौनों से कौन 'खेल' रहा है।
इस साल जनवरी में प्रतापगढ़ जिले के लालगंज परियोजना की आंगनबाड़ी केन्द्र पूरेतिलकराम की इतलेश, साल्हीपुर की रामलली और जोगीपुर की कार्यकर्ता सुमनलता को निलंबित कर दिया गया। इन केंद्रों पर न बच्चों के खेलने के खिलौने थे और न ही पर्याप्त व्यवस्था। ऐसी घोर लापरवाही के चलते बहुतों को निलंबित किया गया है, लेकिन यह भी सही है कि इसके लिए सिर्फ कार्यकर्ता ही अकेले जिम्मेदार नहीं हैं। विभाग द्वारा खिलौना खरीदने का मकसद बच्चों के सामाजिक, भावात्मक, संज्ञानात्मक, शारीरिक व सौन्दर्य परक विकास को बढ़ावा देने के साथ ही बेहतर परिवेश बनाना है। पर यह उद्देश्य लगातार पीछे छूट रहा है। सूबे के कई आंगनबाड़ी केंद्रों की प्रभारी कार्यकर्ताओं से पूछने पर पता चला कि इस साल उन्हें अभी तक खिलौने नहीं मिले और पिछले साल मिले खिलौनों की किट टूट गयी। दरअसल, रस्मी तौर पर कागजी कवायद पूरी कर आंगनबाड़ी केंद्रों पर भेजे जाने वाले खिलौने ऐसे नहीं होते कि बच्चे उनसे कुछ दिन खेल सकें। अव्वल तो आंगनबाड़ी कार्यकर्ता इस किट को बच्चों को सौंपना नहीं चाहती और उनके अपने घर-परिवार के बच्चे ही इस पर हक जमाते हैं, लेकिन अगर दबाव वश उन्हें बच्चों के बीच रखना भी पड़ा तो असमय ही ये खिलौने टूट जाते हैं। क्योंकि खरीददारी में न तो गुणवत्ता का ख्याल रखा गया और न ही पर्याप्त मात्रा में खिलौनों की किट भेजी गयी। विभागीय जांच में भी कई बार यह बात सामने आयी कि दिखावे के लिए आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने कुछ टूटे-फूटे खिलौने केंद्रों पर जरूर रख दिए, लेकिन मद के अनुपात में कहीं पर भी खिलौने नहीं दिखे।
अबकी खरीदे जायेंगे पचास करोड़ के खिलौने : सूबे में मिनी केंद्रों को मिलाकर कुल 188259 आंगनबाड़ी केंद्र हैं। पहले प्रति केंद्र खिलौने का एक हजार रुपये का मद होता था, लेकिन इस बार महंगाई को देखते हुए बजट बढ़ाया गया है। विभागीय सूत्रों के मुताबिक अबकी बार पचास करोड़ रुपये के खिलौने खरीदे जायेंगे। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि गुणवत्ता को लेकर आने वाली शिकायतों के मद्देनजर इस बार अलग ढंग के खिलौने खरीदने की योजना बन रही है।
खिलौनों को सुरक्षित रखने का इंतजाम नहीं : आकृति बोर्ड, पहिया खिलौना, मानवीय, पिक्चर बोर्ड, ग्रोथ चार्ट, रंग भरने वाली किताबें, मोम कलर, गेम, गेंद, चुंबक, मुखौटे, पशु-पक्षियों का चार्ट आदि खिलौनों की किट बच्चों में सीखने की प्रवृत्ति विकसित करती है। आंगनबाड़ी केंद्रों को दिए जाने वाले खिलौनों की किट कुछ इसी तरह की होती है। स्कूलों या अधिकतर कार्यकर्ताओं के घरों में ही चलने वाले केंद्रों पर इन खिलौनों को सुरक्षित रखने के लिए भी कोई इंतजाम नहीं रहता है।
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इस बार टेंडर से खरीदे जायेंगे खिलौने : निदेशक
जाब्यू, लखनऊ : बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार विभाग के निदेशक आनन्द कुमार सिंह कहते हैं कि यह सही है कि अभी तक इस साल केंद्रों पर खिलौने नहीं भेजे जा सके हैं, लेकिन उसे भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी गयी है। निदेशक का कहना है कि अब गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं होगा, इसीलिए उन्होंने टेंडर की प्रक्रिया शुरू की है। प्रयास यही है कि प्रक्रिया जल्द पूरी हो जाये। सिंह के मुताबिक वह खिलौनों के परीक्षण के बाद ही खरीददारी की हरी झंडी देंगे।
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